इच्छा प्रकृति पर शिक्षा चर्चा!

इस अध्याय के लिए एक उपयुक्त शिखर के रूप में, मैं, सबसे असामान्य व्यक्तियों, जिन्हें आज तक मैंने जाना है, में से एक का परिचय कराना चाहता हूँ। मैंने उसे पहली बार चौबीस साल पहले, उसके पैदा होने के कुछ ही मिनटों बाद देखा था। वह कानों के किसी भी शारीरिक लक्षण के बिना दुनिया में आया, और डॉक्टर पर राय देने का दबाव डालने पर उसने स्वीकार किया कि शायद बच्चा जीवन भर के लिए बहरा और गूंगा हो सकता है। मैंने डॉक्टर की राय को चुनौती दी। मुझे ऐसा करने का अधिकार था, मैं बच्चे का पिता था। मैं भी एक निर्णय पर पहुंच गया, और एक राय प्रदान की, लेकिन मैंने अपनी राय चुपचाप व्यक्त की, अपने दिल की गोपनीयता में। मैंने फैसला किया कि मेरे बेटे को सुनना और बोलना होगा। प्रकृति एक बच्चे को कान के बिना भेज सकती थी, लेकिन प्रकृति मुझे पीड़ा की वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए प्रवृत नहीं कर सकती थी। मेरे अपने मन में मैं जानता था कि मेरा बेटा सुनेगा और बोलेगा। कैसे? मैं विश्वस्त था, कोई तरीका अवश्य होगा, और मैं जानता था मैं यह खोज लूँगा। मैं अमर इमर्सन के शब्दों के बारे में सोच रहा था, “चीजों का पूरा पाठक्रम हमें आस्था रखना सिखाता है हमें केवल आज्ञा मानने की जरूरत है।हम में से प्रत्येक के लिए मार्गदर्शन है, और धीरे से सुनकर, हम सही शब्द सुन लेंगे।” सही शब्द? इच्छा! किसी भी अन्य चीज से अधिक, मैंने इच्छा की, कि मेरे बेटे को एक बहरा गूंगा नहीं होना चाहिए। उस इच्छा से मैं कभी पीछे नहीं हटा, एक पल के लिए भी नहीं। कई साल पहले, मैंने लिखा था, “हमारी एकमात्र सीमायें वही होती हैं जो हम अपने मन में स्थापित करते हैं।” पहली बार मुझे हैरानी हुई कि वह बयान सत्य था। मेरे सामने बिस्तर पर पड़ा एक अभी-अभी पैदा हुआ बच्चा था, सुनने के प्राकृतिक उपकरणों से विहीन। भले ही वह सुन और बोल सके, वह स्पष्ट रूप से जीवन भर के लिए विरूपित था। निश्चित रूप से, यह एक सीमा थी जिसे उस बच्चे ने अपने खुद के मन में स्थापित नहीं की थी!

मैं इसके बारे में क्या कर सकता था? किसी तरह मैं, कानों की सहायता के बिना उसके मस्तिष्क को ध्वनि संदेश पहुँचाने के साधन और तरीकों के लिए उस बच्चे के मन में मेरी अपनी तीव्र इच्छा का प्रत्यारोपण करने का रास्ता खोज लूँगा। जितनी जल्दी बच्चा सहयोग करने लायक बड़ा होता, मैं उसके दिमाग को सुनने की तीव्र इच्छा से इस प्रकार पूरी तरह भर देता कि प्रकृति, इसके अपने तरीकों द्वारा इसे भौतिक वास्तविकता में बदल देती। इस सारी सोच ने मेरे अपने मन में जगह ले ली, लेकिन मैंने इसके बारे में किसी से बात नहीं की। हर दिन, मैं एक बेटे का मूक बधिर होना स्वीकार नहीं करने की उस प्रतिज्ञा को दोहराता जो मैंने खुद से की थी। जैसे ही वह बड़ा हुआ, और अपने चारों ओर की चीजों पर ध्यान देना शुरू किया, हमने देखा कि उसके पास थोड़ी मात्रा में सुनने की शक्ति है। जब वह उस उम्र में पहुंचा जहाँ बच्चे आमतौर पर बात करना शुरू कर देते हैं, उसने बात करने का कोई प्रयास नहीं किया, लेकिन हम उसके कार्यों से बता सकते थे कि वह थोड़ी-थोड़ी कुछ आवाजें सुन सकता है। यही सब मैं जानना चाहता था! मैं आश्वस्त था कि यदि वह थोडा भी सुन सकता है, तो वह शायद अधिक से अधिक सुनने की क्षमता का विकास कर सकता है। फिर कुछ हुआ जिसने मुझे आशा दी। यह पूरी तरह से एक अनपेक्षित स्रोत से आया। हमने एक विक्ट्रोला खरीदा। जब बच्चे ने पहली बार संगीत सुना, वह परम आनंद में चला गया, और तुरंत मशीन को हथिया लिया। जल्द ही उसने उनमें से कुछ निश्चित रेकॉर्ड्स की अपनी पसंद प्रदर्शित की, “टिप्परेरी का रास्ता लम्बा है।” एक अवसर पर, विक्ट्रोला के सामने खड़े होकर, डिब्बे के किनारों को दांतों से जोर से पकड़कर उसने वह हिस्सा दो घंटे तक बार-बार बजाया। उसकी इस स्वयं बनाई गई आदत का महत्व हमें कई सालों बाद तक स्पष्ट नहीं हो पाया था क्योंकि हमने उस समय तक ध्वनि के “अस्थि चालन” के सिद्धांत के बारे में कभी नहीं सुना था। उसके विक्ट्रोला का प्रयोग करने के बाद, मैंने पाया कि, जब उसके कर्णमूल हड्डी या मस्तिष्क के आधार पर मैं अपने होंठो से स्पर्श करके, बात करता था, वह मुझे काफी स्पष्ट रूप से सुन सकता था। इन खोजों ने मेरे अधिकार में वह आवश्यक माध्यम दे दिया, जिसके द्वारा मैंने अपने बेटे की सुनने और बोलने की क्षमता के विकास में मदद करने के लिए अपनी तीव्र इच्छा को वास्तविकता में बदलना शुरू किया। उस समय तक वह कुछ निश्चित शब्दों को बोलने की कोशिश कर रहा था। दृष्टिकोण हिम्मत बढाने से कोसों दूर था, लेकिन विश्वास द्वारा समर्थित इच्छा असंभव जैसा कोई शब्द नहीं जानती है!


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